Monday, September 21st, 2020
Close X

लाभांश वितरण कर हो सकता है खत्म

नई दिल्ली
निवेश बढ़ाने के लिए अगले आम बजट में लाभांश वितरण कर (डीडीटी) को खत्म किए जाने की संभावना है। इसके बजाय शेयरधारकों पर कर लगाया जा सकता है। सरकार के इस कदम से निवेशकों की धारणा सुधारने में मदद मिलेगी और कंपनियों के लिए कर की प्रभावी दरों में कमी आएगी।

सूचीबद्ध कंपनियां शेयरधारकों को लाभांश का भुगतान करने से पहले डीडीटी काटती हैं। अधिभार और शिक्षा उपकर के साथ अभी इसकी प्रभावी दर 20.55 फीसदी है। इसके लिए आय कर कानून की धारा 115 (ओ) में संशोधन करना होगा। एक सूत्र ने बताया कि यह कराधान के पुराने तरीके को अपनाने के इरादे से किया जाएगा जहां लाभांश पाने वाले व्यक्ति पर कर लगाया जाता है।

बजट कंपनियों के लिए बार-बार कराधान की समस्या का समाधान करेगा। सरकार का यह कदम प्रत्यक्ष कर ढांचे में बदलाव के लिए गठित समिति की सिफारिशों के अनुकूल है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के पूर्व सदस्य अखिलेश रंजन की अगुआई वाली इस समिति ने डीडीटी को खत्म करने लेकिन दीर्घकालिक पूंजी लाभ कर (एलटीसीजी) और प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) को बरकरार रखने का सुझाव दिया था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद के शीतकालीन सत्र में डीडीटी को प्रतिगामी उपाय बताया था।

कंपनियां अपने मुनाफे में से लाभांश का भुगतान करती हैं जिस पर पहले ही कर का भुगतान किया जाता है। इस तरह डीडीटी से कंपनियों पर कर का बोझ बढ़ता है। विदेशी शेयरधारकों के लिए भी डीडीटी एक बोझ बन गया है क्योंकि वे सीधे तौर पर इसे नहीं चुकाते हैं। यही कारण है कि उन्हें इसके लिए विदेशी कर क्रेडिट लेना मुश्किल होता है। यह विदेशों में किए गए भुगतान के लिए उनके देश में लगने वाला क्रेडिट है। इससे घरेलू निवेशकों को भी मदद मिलेगी क्योंकि वे आय कर का भुगतान करते समय डीडीटी का क्रेडिट ले सकते हैं।

सरकार को हर साल डीडीटी से करीब 60,000 करोड़ रुपए मिलते हैं। अगर सरकार लाभांश के लिए कराधान की पुरानी व्यवस्था अपनाती है तो उसके संग्रह पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। प्रशासनिक सुविधा के लिए डीडीटी की व्यवस्था शुरू की गई थी। इसका मकसद लाभांश वितरण करने वाली कंपनी से कर वसूलना था ताकि शेयरधारकों से कर वसूलने के झंझट से बचा जा सके। शेयरधारक को कम कर देना पड़ता है। अगर कोई शेयरधारक एक साल में 10 लाख रुपए से अधिक लाभांश पाता है तो उससे केवल 10 फीसदी कर लिया जाता है। वेदांत समूह की कराधान प्रमुख पल्लवी जोशी बाखरू ने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में यह कोशिश की जानी चाहिए कि खपत बढ़ाने के लिए शेयरधारकों के हाथ में खर्च करने योग्य अधिक राशि आए और कंपनियों के पास कारोबार के विस्तार और उन्नयन में निवेश के लिए ज्यादा पैसा हो।

बाखरू ने कहा विदेशी शेयरधारकों को अपने देश में डीडीटी के लिए क्रेडिट का दावा करने में संघर्ष करना पड़ता है और अगर उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर कर चुकाना पड़े तो वे कर संधि दरों का दावा कर सकती हैं तो डीडीटी की प्रभावी दर से काफी कम और इस पर आसानी से क्रेडिट लिया जा सकता है। इसलिए डीडीटी को खत्म करने से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा। अशोक माहेश्वरी ऐंड एलएलपी में मैनेजिंग पार्टनर अमित माहेश्वरी ने कहा कि उद्योग लंबे समय से डीडीटी को हटाने की मांग कर रहा है क्योंकि इसके कारण कंपनियों को तीन बार कर देना पड़ता है। इससे निवेशकों पर भी कर का बोझ बढ़ता है।

Source : Agency

आपकी राय

10 + 13 =

पाठको की राय